मन्त्रणा के पश्चात् उद्योग—जिस दिन अभिराम स्वामी विमला पर क्रुद्ध होकर उसे गृह-बहिष्कृत कर देते हैं, उसके अगले दिन प्रदोष-काल में विमला अपने कक्ष में बैठी वेश-भूषा सँवार रही थी। पंचत्रिंशद्-वर्षीया की वेश-भूषा? क्यों भला न करे? क्या अवस्था से यौवन चला जाता है? यौवन तो रूप और मन से जाता है; जिसका रूप नहीं, वह बीस वर्ष की अवस्था में भी वृद्धा है; जिसका रूप विद्यमान है, वह सर्वदा युवती ही है। जिसके मन में रस नहीं, वह चिरकाल प्रवीण है; जिसके मन में रस है, वह चिरकाल नवीन है। विमला का शरीर आज भी रूप से ढलमल कर रहा है, और मन रस से टलमल कर रहा है। अवस्था के साथ तो रस का और भी परिपाक होता है; पाठक महोदय की यदि किंचित् अवस्था हो चुकी हो, तो वे इस बात को अवश्य स्वीकार करेंगे।
कौन बिमला के उन तांबूल-राग-रक्त ओष्ठाधर को देखकर कहेगा कि वह युवती नहीं है? उसके कज्जल-गहन विशाल लोचनों के चकित कटाक्ष देखकर कौन कहेगा कि वह चतुर्विंशति के पार जा चुकी है? क्या नेत्र हैं! सुदीर्घ; चंचल; आवेशमय। किसी-किसी प्रगल्भ-यौवना कामिनी के नेत्र देखते ही मन में यह बोध होता है कि यह रमणी दर्पिता है; यह रमणी सुख-लालसा से परिपूर्ण है। बिमला के नेत्र भी वैसे ही हैं। मैं निश्चित रूप से पाठक महाशय से कहता हूँ कि बिमला युवती है, उसे स्थिर-यौवना भी कहा जा सकता है। उसकी उस चंपक-वर्ण त्वचा की कोमलता देखकर कौन कहेगा कि कोई षोडशी उससे अधिक कोमला होगी?
अलक-केश का जो एक अति क्षुद्र कुंचित गुच्छ कर्णमूल से असावधानीवश कपोल-प्रदेश पर आ गिरा है, उसे देखकर कौन कहेगा कि युवती के कपोल पर युवती के केश नहीं गिरे हैं? पाठक! मनश्चक्षु उन्मीलित कीजिए; जहाँ बैठकर दर्पण के सम्मुख बिमला केश-विन्यास कर रही है, उसे देखिए; विशाल केश-पाश को वाम हस्त में लेकर, सम्मुख रखकर जिस प्रकार वह उसमें कंघी फिरा रही है, उसे देखिए; अपने यौवन-भाव को देखकर जो मंद-मंद मुस्कुरा रही है, उसे देखिए; बीच-बीच में वीणा-निंदित मधुर स्वर में जो मृदु-मृदु गान कर रही है, उसे श्रवण कीजिए; देखकर और सुनकर बताइए कि बिमला से बढ़कर कौन-सी नवीना आपकी मनोमोहिनी है?
विमला ने केश विन्यस्त कर कवरी-बंधन न किया; पृष्ठदेश पर वेणी लंबित की। सुगंधवारि-सिक्त रूमाल से मुख स्वच्छ किया; गुलाब, पूग और कपूर से पूर्ण तांबूल से पुनः अपने ओष्ठाधर रंजित किए; मुक्ता-भूषित कंचुकी लेकर वक्ष पर धारण की; सर्वांग में कनक-रत्न-भूषण परिधान किए; फिर न जाने क्या विचार कर उनका किंचिदंश त्याग दिया; विचित्र कारुकार्य-खचित वसन पहना; मुक्ता-शोभित पादुकाएँ ग्रहण कीं; और सुविन्यस्त चिकुर में युवराज-दत्त बहुमूल्य मुक्ताहार रोपित किया।
विमला सुसज्जित होकर तिलोत्तमा के कक्ष में गईं। तिलोत्तमा देखते ही विस्मयापन्न हो गईं; हँसकर बोलीं, “यह क्या, विमला! यह वेश किसलिए?”
विमला ने कहा, “तुझे उस बात से क्या प्रयोजन?”
ति। सत्य कहो न, कहाँ जाओगे?
वि। मैं कहाँ जाऊँगी, यह तुमसे किसने कहा?
तिलोत्तमा अप्रतिभ हो गईं। विमला उनकी लज्जा देखकर सकरुण ईषत् मुस्कुराकर बोलीं, “मैं बहुत दूर जाऊँगी।”
तिलोत्तमा का मुख प्रफुल्ल कमल के समान हर्षविकसित हो उठा। उन्होंने मृदु स्वर में पूछा, "कहाँ जाओगे?
विमला उसी भाँति अपनी हँसी दबाते हुए बोलीं, “अनुमान लगाओ न?”
तिलोत्तमा उनके मुख की ओर देखती रह गईं।
विमला तब उनका हाथ थामकर, “सुनो तो सही,” कहकर उन्हें गवाक्ष के समीप ले गईं। वहाँ उन्होंने उनके कान में धीरे से कहा, “मैं शैलेश्वर-मंदिर जाऊँगी; वहाँ किसी राजपुत्र से भेंट होगी।”
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