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दुर्गेशनंदिनी Matribhasa Hindi · द्वितीय खण्ड — अष्टादश परिच्छेद : प्रतियोगिता
A historical fiction-themed illustration for दुर्गेशनंदिनी

द्वितीय खण्ड — अष्टादश परिच्छेद : प्रतियोगिता

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जगतसिंह कारामुक्त होकर पितृ-शिविर गमन के उपरांत अपने स्वीकारानुसार मुग़लों और पठानों के मध्य संधि-संबंध संपादित कराया। पठानों ने दिल्लीश्वर की अधीनता स्वीकार करके भी उत्कल के अधिपति बने रहे। संधि का विस्तृत विवरण इतिवृत्त में वर्णनीय है। इस स्थल पर अति-विस्तार निष्प्रयोजन है। संधि-समाप्ति के उपरांत दोनों दल कुछ दिन अपने पूर्वावस्थित स्थानों पर ही रहे। नवीन प्रीति के संवर्धनार्थ क़तलू ख़ाँ के पुत्रों को साथ लेकर प्रधान राजमंत्री ख़्वाजा ईसा तथा सेनापति उस्मान राजा मानसिंह के शिविर में गए; सार्धशत हस्ती और अन्य महार्घ द्रव्य उपढौकन देकर राजा को परितोष प्रदान किया; राजा ने भी उनका बहुविध सम्मान करके सबको ख़िलअत देकर विदा किया।

इस प्रकार संधि-संबंध संपन्न करने तथा शिविर-भंग के उद्योग में कुछ दिन व्यतीत हो गए।

अंततः जब राजपूत सेना के पटना प्रस्थान का समय समीप आ पहुँचा, तब जगतसिंह एक दिन अपराह्न में अपने सहचरों के साथ पठान-दुर्ग में उस्मान आदि से विदा लेने गए। कारागार में हुई भेंट के पश्चात्, उस्मान ने राजपुत्र के प्रति फिर कभी सौहार्द-भाव प्रदर्शित नहीं किया। आज उन्होंने केवल सामान्य बातचीत करके उन्हें विदा कर दिया।

जगतसिंह उस्मान से खिन्न मन विदा लेकर ख़्वाजा ईसा से विदा लेने गए। वहाँ से वे आयशा से विदा लेने के अभिप्राय से चले। एक अन्तःपुर-रक्षक द्वारा उन्होंने आयशा के पास समाचार भेजा, तथा प्रहरी से कह दिया कि, “कहना कि नवाब साहब के लोकान्तर के पश्चात् उनसे फिर भेंट नहीं हुई है। अब मैं पटना जा रहा हूँ, पुनः भेंट की सम्भावना अति विरल है; अतः उन्हें अभिवादन करके जाना चाहता हूँ।”

खोजा किंचित् काल पश्चात् लौटकर बोला, “नवाबपुत्री ने कहला भेजा है कि वे युवराज से भेंट न करेंगी; अपराध क्षमा करें।”

राजपुत्र संवर्धित विषाद के साथ स्वकीय शिविर की ओर उन्मुख हुए। दुर्गद्वार पर उन्होंने देखा कि उस्मान उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

राजकुमार उस्मान को देखकर पुनः अभिवादन कर आगे बढ़ गए, उस्मान उनके पीछे-पीछे चले। राजकुमार ने कहा, “सेनापति महोदय! यदि आपकी कोई आज्ञा हो तो प्रकट कीजिए, मैं उसका पालन कर कृतार्थ होऊँगा।”

उस्मान बोले, “आपसे एक विशेष वार्ता करनी है, इतने सहचरों के समक्ष वह कह न सकूँगा; सहचरों को आगे बढ़ने की अनुमति दीजिए और एकाकी मेरे साथ आइए।”

राजपुत्र निःसंकोच अपने सहचरों को आगे बढ़ जाने की आज्ञा देकर एकाकी अश्वारूढ़ हो पठान के साथ-साथ चल पड़े; उस्मान ने भी अश्व मँगवाकर उस पर आरोहण किया। किंचित् दूरी गमन करने के उपरांत उस्मान राजपुत्र के साथ एक सघन शाल-वन के मध्य प्रविष्ट हुए। वन के मध्यस्थल में एक भग्न अट्टालिका थी; प्रतीत होता था कि अति प्राचीन काल में कोई राजविद्रोही इस स्थल पर आकर काननाभ्यंतर में छिपा रहा होगा। शाल-वृक्ष से घोड़ों को बाँधकर उस्मान राजपुत्र को उस भग्न अट्टालिका के भीतर ले गए। अट्टालिका मनुष्यशून्य थी। मध्यभाग में एक विस्तृत प्रांगण था; उसके एक पार्श्व में एक यावनिक समाधि-गर्त प्रस्तुत था, किंतु उसमें शव न था; अपर पार्श्व में चिता-सज्जा विद्यमान थी, किंतु कोई मृतदेह न था।

प्रांगण में आने पर राजकुमार ने पूछा, “यह सब क्या है?”

उस्मान ने कहा, “यह सब मेरी आज्ञा से हुआ है; यदि आज मेरी मृत्यु हो जाए, तो महाशय मुझे इस कब्र में समाधिस्थ करेंगे, कोई न जानेगा; यदि आप देह-त्याग करें, तो इस चिता पर ब्राह्मण द्वारा आपका दाह-संस्कार करवाऊँगा, अन्य कोई न जानेगा।”

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