दिन बीत जाते हैं। तुम जो चाहो करो, दिन व्यतीत हो जाएँगे, रहेंगे नहीं। जिस अवस्था में चाहो रहो, दिन व्यतीत हो जाएँगे, रहेंगे नहीं। हे पथिक! क्या तुम अत्यंत दारुण झंझा-वृष्टि में आन पड़े हो? क्या मस्तक पर उच्च रव से घनगर्जन हो रहा है? क्या वृष्टि से आप्लावित हो रहे हो? क्या अनावृत शरीर पर करकाभिघात हो रहा है? क्या तुम्हें आश्रय नहीं मिल रहा? क्षण भर धैर्य धरो, यह दिन व्यतीत हो जाएगा – रहेगा नहीं! क्षण भर प्रतीक्षा करो; दुर्दिन मिट जाएगा, सुदिन आएगा; भानुदय होगा; कल तक प्रतीक्षा करो।
किसके दिन व्यतीत नहीं होते? किसके दुःख को स्थायी करने के लिए दिन ठहरा रहता है? तो फिर क्यों विलाप करते हो?
किसका दिन नहीं बीता? तिलोत्तमा धूल में पड़ी है, फिर भी दिन बीतता जा रहा है।
विमला के हृत्कमल में प्रतिशोध-रूपी कालफणि वास करके उसके समस्त शरीर को विष से जर्जर कर रही है, एक क्षण भी उसका दंश असह्य है; एक दिन में कितने क्षण! तथापि, क्या दिन बीत न गया?
कतलू ख़ाँ मसनद पर हैं; शत्रुजयी; सुखपूर्वक दिन व्यतीत हो रहे हैं। दिन बीतते चले जाते हैं, ठहरते नहीं।
जगत्सिंह रुग्णशय्या पर थे; रोगी के लिए दिन कितने दीर्घ होते हैं, यह कौन नहीं जानता? तथापि दिन बीत गए!
दिन व्यतीत होते गए। दिनों-दिन जगतसिंह को आरोग्य लाभ होने लगा। यमदंड से सर्वथा निष्कृति पाकर राजकुमार दिन-प्रतिदिन निरापद होने लगे। सर्वप्रथम शरीर की ग्लानि दूर हुई; तत्पश्चात् आहार; तत्पश्चात् बल; और अंततः चिंता।
प्रथम चिंता — तिलोत्तमा कहाँ है? राजकुमार ज्यों-ज्यों आरोग्य पाने लगे, त्यों-त्यों संवर्धित व्याकुलता के साथ सबसे पूछने लगे; किसी ने संतोषजनक उत्तर न दिया। आयशा जानती नहीं; उस्मान बताते नहीं; दास-दासी जानते नहीं, या किस संकेत के वशीभूत होकर नहीं बोलते। राजकुमार कंटक-शय्याशायी के समान चंचल हो उठे।
द्वितीय चिंता — निज भविष्य। “क्या होगा?” सहसा इस प्रश्न का उत्तर कौन दे सकता है? राजपुत्र ने देखा, वे बंदी हैं। करुणा-हृदय उस्मान तथा आयेशा की अनुकंपा से वे कारागार के स्थान पर सुसज्जित, सुवासित शयनकक्ष में वास कर रहे हैं; दास-दासी उनकी सेवा कर रहे हैं; जब जिस वस्तु की आवश्यकता होती है, वह इच्छा व्यक्त करने से पूर्व ही उन्हें प्राप्त हो जाती है; आयेशा सहोदराधिक स्नेह के साथ उनकी परिचर्या कर रही हैं; तथापि द्वार पर प्रहरी है; स्वर्ण-पिंजर-वासी, सुरस पेय से परितृप्त विहंग के समान वे अवरुद्ध हैं। वे कब मुक्ति प्राप्त करेंगे? मुक्ति-प्राप्ति की क्या संभावना है? उनकी समस्त सेना कहाँ है? सेनापति-विहीन होकर उनकी क्या दशा हुई?
तृतीय चिंता — आयेशा। यह चमत्कारिणी, परहित-मूर्तिमती, किस प्रकार इस मृण्मय पृथ्वी पर अवतरित हुई?
जगतसिंह ने देखा कि आयशा को न विराम था, न क्लान्ति का बोध और न अवहेलना। वह अहोरात्र रोगी की शुश्रूषा कर रही थीं। जब तक राजपुत्र नीरोग न हो गए, तब तक वे नित्य प्रति प्रातः देखते कि प्रभात-सूर्य-स्वरूपा आयशा हाथ में कुसुम-दाम लिए लावण्यमय पद-क्षेप से निःशब्द चली आ रही हैं। वे नित्य देखते कि जब तक स्नानादि कार्यों का समय बीत न जाता, तब तक आयशा उस कक्ष का त्याग न करती थीं। वे नित्य देखते कि क्षण भर पश्चात् ही प्रत्यागमन करके केवल अत्यंत आवश्यकतावश ही गात्रोत्थान करती थीं; जब तक उनकी जननी बेगम उनके समीप किंकरी न भेज देतीं, तब तक वे उनकी सेवा से क्षान्त न होती थीं।
रुग्ण-शय्या पर किसने शयन नहीं किया है? यदि किसी की रुग्ण-शय्या के सिरहाने बैठकर किसी मनोमोहिनी रमणी ने व्यजन किया हो, तो वही जानता है कि रोग में भी सुख है।
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