विमला के पलायन के क्षण भर पश्चात् ही एक कर्मचारी अत्यंत व्यग्रतापूर्वक जगत्सिंह के कारागार में आकर बोला, “युवराज! नवाब साहब का अंतकाल उपस्थित है, उन्होंने आपको स्मरण किया है।”
युवराज चमत्कृत होकर बोले, “यह क्या!”
राजपुरुष ने कहा, “अंतःपुर के भीतर शत्रु प्रवेश कर नवाब साहब पर आघात करके पलायन कर गया है। अभी प्राण-त्याग नहीं हुआ है, किंतु अब तनिक भी विलंब नहीं है; आप शीघ्र चलिए, अन्यथा भेंट न हो सकेगी।”
राजकुमार ने कहा, “इस समय मुझसे भेंट का क्या प्रयोजन?”
दूत ने कहा, “मैं क्या जानूँ? मैं तो मात्र सन्देशवाहक हूँ।”
युवराज दूत के साथ अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि कतलू ख़ाँ का जीवन-दीप सचमुच निर्वाणप्राय हो चला था, अंधकार के आगमन में अब तनिक भी विलंब न था, तथा चारों ओर उस्मान, आयशा, मुमूर्षु के अल्पवयस्क पुत्र, पत्नियाँ, उपपत्नियाँ, दासियाँ एवं अमात्यवर्ग आदि उन्हें घेरे हुए थे। रोदन-क्रंदन का कोलाहल व्याप्त था; लगभग सभी उच्च स्वर में विलाप कर रहे थे; बालक बिना समझे ही रो रहे थे; किंतु आयशा चीत्कार करके नहीं रो रही थी। आयशा की नयन-धारा से उसका मुख प्लावित हो रहा था; वह निःशब्द पिता का मस्तक अपने अंक में धारण किए हुए थी। जगत्सिंह ने देखा—वह मूर्ति स्थिर, गंभीर और निस्पंद थी।
युवराज के प्रवेश करते ही ख्वाजा ईसा नामक अमात्य उनका कर थामकर उन्हें क़तलू ख़ाँ के समीप ले गए; जिस प्रकार किसी बधिर को उच्च स्वर में संबोधित किया जाता है, उसी स्वर में उन्होंने कहा, “युवराज जगतसिंह आए हैं।”
कतलू ख़ाँ ने क्षीण स्वर में कहा, “मैं शत्रु हूँ; मर रहा हूँ;—राग-द्वेष का त्याग करो।”
जगत्सिंह समझकर बोले, “इस समय विदा लेता हूँ।”
कतलू ख़ाँ ने पुनरपि उसी स्वर में कहा, — "याचना—स्वीकार।
जगतसिंह ने पूछा, “क्या स्वीकार करूँ?”
कतलू ख़ाँ पुनरपि कहने लगे, “बालको—युद्ध—बड़ी तृषा है।”
आयेशा ने मुख पर शरबत का सिंचन किया।
युद्ध—काम—नहीं—संधि—
कतलू ख़ाँ मौन हो गए। जगत्सिंह ने कोई उत्तर न दिया। कतलू ख़ाँ उत्तर की प्रतीक्षा में उनके मुख की ओर देखते रहे। उत्तर न पाकर कष्टपूर्वक बोले, “अस्वीकार?”
युवराज ने कहा, “यदि पठान दिल्लीश्वर का प्रभुत्व स्वीकार कर लें, तो मैं संधि हेतु अनुरोध करना स्वीकार करता हूँ।”
कतलू ख़ाँ ने पुनरपि अर्धस्फुट श्वास से कहा, “उड़ीसा?”
राजपुत्र ने समझकर कहा, “यदि मैं कार्य संपन्न कर सकूँ, तो आपके पुत्र उड़ीसाच्युत नहीं होंगे।”
कतलु की मृत्यु-क्लेश-निपीड़ित मुखकांति प्रदीप्त हो उठी।
मुमूर्षु ने कहा, “आप—मुक्त—जगदीश्वर—मंगल—” जगत्सिंह चले जा रहे थे, आयशा ने मुख अवनत कर पिता से कुछ कहा। कतलू ख़ाँ ने ख़्वाजा ईसा की ओर देखा और फिर प्रस्थान करते हुए राजकुमार की ओर दृष्टिपात किया। ख़्वाजा ईसा ने राजकुमार से कहा, “जान पड़ता है, आपसे अभी कुछ और बात शेष है।”
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