विमला अभिराम स्वामी के कुटीर के भीतर दंडायमान हैं। अभिराम स्वामी भूमि पर योगासन में बैठे हैं। जगत्सिंह के साथ जिस प्रकार विमला और तिलोत्तमा की भेंट हुई थी, विमला उसका आद्योपांत वर्णन अभिराम स्वामी के समक्ष कर रही थीं; वर्णन समाप्त कर उन्होंने कहा, “आज चतुर्दश दिवस है; कल पक्ष पूर्ण होगा।” अभिराम स्वामी ने कहा, “अब क्या स्थिर किया है?”
विमला ने उत्तर दिया, “उचित परामर्श के लिए ही आपके पास आई हूँ।”
स्वामी ने कहा, “उत्तम, मेरा परामर्श यह है कि इस विषय को अब और मन में स्थान न दो।”
बिमला अत्यंत विषण्ण वदन से मौन साधे रहीं। अभिराम स्वामी ने पूछा, “विषण्ण क्यों हो गई?”
विमला ने कहा, “तिलोत्तमा का क्या उपाय होगा?”
अभिराम स्वामी ने सविस्मय पूछा, “क्यों? क्या तिलोत्तमा के मन में अनुराग का संचार हुआ है?”
विमला किंचित् काल मौन रहकर बोलीं, “आपसे कितना कहूँ! मैं आज चौदह दिनों से अहोरात्र तिलोत्तमा के हाव-भाव भली-भांति देख रही हूँ, मेरे मन में ऐसा बोध हुआ है कि तिलोत्तमा के मन में अति प्रगाढ़ अनुराग का संचार हुआ है।”
परमहंस ने ईषत् हास्य कर कहा, “तुम स्त्रियाँ हो; मन में अनुराग के लक्षण देखते ही उसे प्रगाढ़ अनुराग मान लेती हो। विमले, तिलोत्तमा के मानसिक सुख के निमित्त चिंतित न हो; बालिका-स्वभाववश ही प्रथम दर्शन में उसमें मनश्चाञ्चल्य उत्पन्न हुआ है; इस विषय में कोई चर्चा न छेड़े जाने पर वह शीघ्र ही जगतसिंह को विस्मृत कर देगी।”
विमला ने कहा, “नहीं, नहीं, स्वामी! वह लक्षण नहीं है। पक्ष-भर के भीतर तिलोत्तमा के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है! तिलोत्तमा मेरे अथवा अपनी सखियों के साथ अब उस प्रकार अहोरात्र हँसकर बातें नहीं करती; तिलोत्तमा अब प्रायः बातें ही नहीं करती; तिलोत्तमा की पुस्तकें पलंग के नीचे पड़ी सड़ रही हैं; तिलोत्तमा के पौधे जल के अभाव में सूख गए; तिलोत्तमा के पक्षियों की अब वैसी देखभाल नहीं रही; तिलोत्तमा स्वयं आहार नहीं करती; रात्रि में निद्रा नहीं लेती; तिलोत्तमा वेश-भूषा नहीं करती; तिलोत्तमा जो कभी विचारमग्न नहीं होती थी, अब अहनिश अन्यमनस्क रहती है। तिलोत्तमा के मुख पर कालिमा छा गई है।”
अभिराम स्वामी सुनकर निस्तब्ध रह गए। क्षण भर पश्चात बोले, “मेरी यह धारणा थी कि मात्र दर्शन से प्रगाढ़ अनुराग उत्पन्न नहीं हो सकता; तथापि स्त्री-चरित्र, विशेषतः बालिका-चरित्र, ईश्वर ही जाने। किंतु क्या करोगे? वीरेंद्र इस संबंध में सहमत नहीं होगा।”
बिमला ने कहा, “मैंने उसी आशंका से अब तक इसका कोई उल्लेख नहीं किया, मंदिर के भीतर भी जगत्सिंह का परिचय नहीं दिया। किंतु अब यदि सिंह महाशय”,—यह कहते हुए बिमला के मुख पर किंचित् भावांतर हुआ—,“अब यदि सिंह महाशय ने मानसिंह के साथ मित्रता कर ली, तो जगत्सिंह को जामाता बनाने में क्या हानि है?”
अ. मानसिंह ही भला सहमत क्यों होंगे?
वि। न सही, युवराज स्वाधीन हैं।
अ। जगत्सिंह ही भला वीरेन्द्रसिंह की कन्या से विवाह क्यों करेगा?
वि। जाति-कुल का दोष किसी पक्ष में नहीं है, जयधरसिंह के पूर्वज भी यदुवंशी हैं।
अ। क्या यदुवंशीय कन्या मुसलमान के श्यालकपुत्र की वधू बनेगी?
विमला ने उदासीन की ओर स्थिर दृष्टि से देखकर कहा, “भला क्यों न होगा, यदुवंश का कौन-सा कुल घृणित है?”
यह बात कहते ही क्रोध से परमहंस के नेत्रों से अग्नि प्रस्फुरित होने लगी; वे कठोर स्वर में बोले, “पापियसि! क्या अपना दुर्भाग्य विस्मृत नहीं कर बैठी? दूर हो जा!”
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