पितृहीना अनाथ, रुग्ण शय्या पर पड़ी है; — जगतसिंह उसकी शय्या के पार्श्व में हैं। दिन बीतता है, रात्रि बीतती है, पुनः दिन आता है; पुनः दिन बीतता है, रात्रि आती है। राजपूत-कुल-गौरव उसके भग्न पलंग के पास बैठकर शुश्रूषा कर रहे हैं; उस दीना, शब्दहीना विधवा के अविरल कार्य में सहायता कर रहे हैं। आधिक्षीणा दुखिया उनकी ओर देखती है या नहीं — उसके शिशिर-निपीड़ित पद्म-मुख पर पूर्वकाल की वह मुस्कान आती है या नहीं, यही देखने की आकांक्षा से वे उसके मुख की ओर निहार रहे हैं।
कहाँ है शिविर? कहाँ है सेना?—शिविर भंग कर सेना पटना प्रस्थान कर चुकी है! कहाँ हैं सब अनुचर? दारुकेश्वर-तट पर प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कहाँ हैं प्रभु? प्रबल आतप से विशोषित सुकुमार कुसुम-कलिका को नयन-वारि के सिंचन से पुनः उत्फुल्ल कर रहे हैं।
कुसुम-कलिका क्रमशः पुनः प्रफुल्लित होने लगी। इस संसार का प्रधान ऐंद्रजालिक स्नेह है! व्याधि-प्रतिकार में प्रधान औषधि प्रणय है। अन्यथा हृदय-व्याधि का उपशम कौन कर सकता है?
जिस प्रकार निर्वाणोन्मुख दीप बिंदु-बिंदु तैल-संचार से धीरे-धीरे पुनः हँस उठता है, जिस प्रकार निदाघ-शुष्क वल्लरी आषाढ़ के नव-वारि-सिंचन से धीरे-धीरे पुनर्वार विकसित होती है; जगत्सिंह को पाकर तिलोत्तमा तद्वत् दिन-प्रतिदिन पुनर्जीवन पाने लगीं।
धीरे-धीरे सबल होकर वे पर्यंक पर बैठने में समर्थ हो सकीं। विमला की अनुपस्थिति में दोनों समीप बैठकर अनेक दिनों के मनोभावों को व्यक्त कर सके। कितनी ही बातें उन्होंने कीं, मानस-कृत कितने ही अपराध स्वीकार किए, कितनी अनुचित आशाएँ मन में उदित होकर मन ही में शमित हो गई थीं, वह सब कहा; जाग्रत् अथवा सुप्त अवस्था में कितने ही मनमोहन स्वप्न देखे थे, वह भी व्यक्त किया। रुग्णशय्या पर अचेतनावस्था में जो एक स्वप्न देखा था, एक दिन वह भी कह सुनाया—
मानो नववसन्त की शोभा से परिपूर्ण एक लघु पर्वत-शिखर पर वह जगत्सिंह के साथ पुष्प-क्रीड़ा कर रही थीं; राशि-राशि वसन्त-कुसुमों का चयन करके उन्होंने मालाएँ गूँथीं, एक माला स्वयं अपने कण्ठ में धारण की और दूसरी माला जगत्सिंह के कण्ठ में पहना दी; जगत्सिंह की कटि में बँधी असि के स्पर्श से वह माला छिन्न-भिन्न हो गई।
“अब आपके कण्ठ में माला न पहनाऊँगी, चरणों में निगड डालकर बाँधूँगी”—यह कहकर मानो उन्होंने कुसुमों का निगड रचा।
वह निगड पहनाने लगीं कि जगत्सिंह तुरंत परे हट गए। तिलोत्तमा पीछे-पीछे दौड़ पड़ीं; जगत्सिंह द्रुत वेग से पर्वत से उतरने लगे; मार्ग में एक क्षीणकाय निर्झरिणी थी, जगत्सिंह छलांग लगाकर उसे पार कर गए; तिलोत्तमा नारी थीं—छलांग मारकर पार न हो सकीं, जहाँ निर्झरिणी संकीर्ण हुई होगी, वहीं से पार करेंगी—इस आशा में वह निर्झरिणी के किनारे-किनारे दौड़ती हुई पर्वत से नीचे उतरने लगीं! निर्झरिणी का संकीर्ण होना तो दूर रहा, वह जितना आगे बढ़तीं, उसका विस्तार उतना ही बढ़ता जाता; निर्झरिणी क्रमशः लघु नदी बनी, वह लघु नदी धीरे-धीरे बड़ी नदी में परिणत हो गई; और अब जगत्सिंह दिखाई न देते थे; तट अत्यंत उच्च और अति विषम था, अब पद-संचालन असंभव हो चला था; उस पर भी तिलोत्तमा के चरणों के नीचे की तट-भूमि की मिट्टी खंड-खंड होकर स्खलित हो गंभीर नाद के साथ जल में गिरने लगी, नीचे प्रचंड घूर्णित जलावर्त था, जिसे देखने का भी साहस न होता था।
तिलोत्तमा पुनः पर्वत पर आरोहण कर नदी के ग्रास से भाग निकलने का प्रयत्न करने लगीं; पथ विषम था, चरण उठते न थे; तिलोत्तमा उच्च स्वर में रोने लगीं; अकस्मात् कालमूर्ति कतलू ख़ाँ पुनरुज्जीवित होकर उनका मार्ग रोक खड़ा हुआ; कण्ठ की पुष्प-माला तत्क्षण गुरुभार लौह-शृंखला बन गई; कुसुम-निगड हस्तच्युत होकर स्वयं उन्हीं के चरणों में आ गिरा; वह निगड तुरंत लौह-निगड बनकर पैरों में लिपट गया; अकस्मात् समस्त अंग स्तब्ध हो गए; तब कतलू ख़ाँ उनका गलदेश पकड़कर, उन्हें घुमाते हुए, नदी की तरंग-प्रवाह में निक्षेपित कर दिया।
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