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दुर्गेशनंदिनी Matribhasa Hindi · द्वितीय खण्ड — पंचदश परिच्छेद : मुक्त कण्ठ
A historical fiction-themed illustration for दुर्गेशनंदिनी

द्वितीय खण्ड — पंचदश परिच्छेद : मुक्त कण्ठ

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तिलोत्तमा और दासी के कक्ष-मध्य से प्रस्थान करने के उपरांत आयेशा शय्या पर आकर बैठ गईं; वहाँ बैठने के लिए अन्य कोई आसन न था; जगत्सिंह समीप ही खड़े हो गए।

आयशा अपनी कबरी से एक गुलाब निकालकर उसकी पंखुड़ियों को नखों से नोचती हुई बोलीं, “राजकुमार, आपके भावों से बोध होता है कि आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। यदि मुझसे आपका कोई कार्य सिद्ध हो सकता हो, तो कहने में संकोच न कीजिएगा; आपका कार्य करके मैं परम सुखी होऊँगी।”

राजकुमार ने कहा, “नवाबपुत्री! इस समय मुझे किसी विशेष वस्तु की आवश्यकता नहीं है। इसी कारण मैं आपसे भेंट का अभिलाषी नहीं था। मेरा तो केवल यही कहना है कि जिस दशा में मैं आ पड़ा हूँ, उसमें आपसे पुनः भेंट होगी, ऐसी आशा मैं नहीं रखता; समझता हूँ कि यही हमारी अंतिम भेंट है। आपके जिस ऋण से मैं आबद्ध हूँ, भला वचनों से उसका क्या प्रत्युपकार करूँ? और कर्म से भी कभी उसका प्रत्युपकार कर सकूँगा, अपने ऐसे अदृष्ट पर मुझे भरोसा नहीं। केवल यही भिक्षा है कि यदि कभी मेरे साध्य में हो, यदि कभी दिन फिरें, तो मुझे कोई भी आज्ञा देने में संकोच न कीजिएगा।”

जगत्सिंह का स्वर ऐसा कातर एवं नैराश्यव्यंजक था कि उससे आयेशा भी व्यथित हो उठीं; आयेशा ने कहा, “आप इतने निराश क्यों हो रहे हैं? एक दिन का अमंगल अगले दिन नहीं रहता।”

जगतसिंह बोले, “मैं सर्वथा निराश नहीं हुआ हूँ, किंतु अब और आशा सँजोने की मेरी इच्छा नहीं होती। इस जीवन को त्यागने के सिवा अब इसे धारण किए रहने की मेरी कोई अभिलाषा नहीं रही। इस बंदीगृह को त्यागने की भी मेरी कोई लालसा नहीं है। मेरे मन के समस्त दुःख को आप नहीं जानते, और मैं उसे व्यक्त भी नहीं कर सकता।”

जिस करुण स्वर में राजपुत्र बोले, उससे आयेशा विस्मित हुईं और अधिक कातर हो गईं। तब फिर नवाबपुत्री-भाव न रहा; दूरी न रही; स्नेहमयी रमणी ने, रमणी के समान यत्न से, अपने कोमल करपल्लवों में राजपुत्र का कर धारण किया, फिर उसी क्षण उनका हस्त त्यागकर, राजपुत्र के मुख की ओर ऊर्ध्वदृष्टि करके बोलीं, “कुमार! यह दारुण दुःख तुम्हारे हृदय में क्यों है? मुझे पराया न समझो। यदि साहस दो, तो कहूँ — बीरेंद्रसिंह की कन्या क्या ___”

आयशा की बात समाप्त भी न होने पाई थी कि राजकुमार ने कहा, “उन बातों से अब क्या प्रयोजन! वह स्वप्न भंग हो चुका है।”

आयशा मौन रहीं; जगत्सिंह भी मौन रहे, दोनों सुदीर्घ काल तक मौन रहे; आयशा उनके ऊपर अपना मुख अवनत किए रहीं।

राजपुत्र अकस्मात् सिहर उठे; उनके करपल्लव पर वारिबिंदु आ गिरा। जगत्सिंह ने दृष्टि नीची कर आयशा के मुखपद्म का अवलोकन किया तो देखा, आयशा रो रही थीं; उनके उज्ज्वल गंडस्थल पर अश्रुओं की अविरल धारा बह रही थी।

राजपुत्र विस्मित होकर बोले, “यह क्या, आयशा? तुम रो रही हो?”

आयशा ने कोई उत्तर न देकर धीरे-धीरे उस गुलाब के फूल को निःशेष छिन्न-भिन्न कर दिया। जब पुष्प शत-खंड हो गया, तब बोलीं, “युवराज! आज जो तुमसे इस प्रकार विदा लूँगी, ऐसा मन में न था। मैं बहुत कुछ सहन कर सकती हूँ, किंतु कारागार में तुम्हें अकेला इस मनोव्यथा की यंत्रणा भोगने को छोड़ जाऊँ, यह मुझसे नहीं हो सकता। जगतसिंह! तुम मेरे साथ बाहर आओ; अश्वशाला में अश्व हैं, दूँगी; आज रात्रि ही अपने शिविर चले जाना।”

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