जगत्सिंह अपने पितृचरणों से ससैन्य विदा होकर जिन-जिन कार्यों में प्रवृत्त हुए, उनसे पठान सेना के मध्य घोर त्रास व्याप्त हो गया। कुमार ने प्रतिज्ञा की थी कि पाँच सहस्र सेना लेकर वे क़तलू ख़ाँ की पञ्चाशत् सहस्र सेना को सुवर्णरेखा पार करा देंगे; यद्यपि अब तक वे उस सीमा तक कृतकार्य होने की सम्भावना प्रदर्शित नहीं कर सके थे, तथापि उन्होंने शिविर से आकर दो सप्ताह के भीतर जिस सेनापतित्व के गुणों का परिचय दिया था, उसे सुनकर मानसिंह ने कहा था, “प्रतीत होता है, मेरे कुमार से राजपूत नाम का पूर्व-गौरव पुनः उद्दीप्त होगा।”
जगत्सिंह भली-भाँति जानते थे कि पाँच सहस्र सेना लेकर पचास सहस्र शत्रुओं को सम्मुख संग्राम में पराङ्मुख कर देना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है, वरन् पराजय अथवा मृत्यु ही निश्चित है। अतः सम्मुख संग्राम का प्रयास न कर, जिससे प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति उत्पन्न न हो, उन्होंने ऐसी रणप्रणाली का अवलम्बन किया। वह अपनी अल्पसंख्यक सेना को सर्वदा अत्यन्त गुप्त रूप से छिपाये रखते; सघन वन के मध्य अथवा उस प्रदेश में समुद्र-तरंगों के समान कहीं निम्न और कहीं उच्च जो भूभाग थे, उनके मध्य ऐसे स्थान पर शिविर स्थापित करते कि समीपवर्ती उच्च भूमि-खण्डों के अन्तराल में, अत्यन्त निकट से भी कोई उनकी सेना को देख न पाता था।
इस प्रकार प्रच्छन्न रहकर, जब भी उन्हें कहीं अल्पसंख्यक पठान सेना का सन्धान मिलता, तो वह तरंग-प्रपात के समान वेग से ससैन्य उन पर टूट पड़ते और उन्हें सर्वथा निश्शेष कर डालते। उनके अनेक गुप्तचर थे; वे फल-मूल-मत्स्यादि के विक्रेता अथवा भिक्षुक, उदासीन, ब्राह्मण, वैद्य इत्यादि के वेष में विविध स्थानों में भ्रमण करके पठान-सेना की गतिविधियों का सन्धान ला देते थे। जगत्सिंह समाचार मिलते ही अत्यन्त सावधानी किन्तु द्रुत गति से ऐसे स्थान पर जाकर अपनी सेना स्थापित करते कि नवागन्तुक पठान-सेना पर सुकौशलपूर्वक और अलक्षित रहकर आक्रमण कर सकें।
यदि पठान-सेना अधिक संख्या में होती, तो जगत्सिंह उन पर आक्रमण करने का कोई स्पष्ट उद्यम न करते; क्योंकि वह जानते थे कि उनकी वर्तमान परिस्थिति में एक युद्ध की पराजय से ही सर्वस्व नष्ट हो जाएगा। तब केवल पठान-सेना के चले जाने पर सावधानी से उसके पीछे-पीछे जाकर उनकी आहार्य सामग्री, अश्व, तोपें इत्यादि छीनकर ले आते थे। और यदि पठान-सेना प्रबल न होकर अल्पसंख्यक होती, तो जब तक वह सेना उनके मनोवांछित स्थान तक न आ जाती, तब तक वह स्थिर होकर गुप्त स्थान में बने रहते; तदुपरान्त अवसर समझकर, क्षुधित व्याघ्र के समान भीषण गर्जन करते हुए धावित होकर उन हतभाग्य पठानों के खण्ड-खण्ड कर डालते।
उस स्थिति में पठानों को निकट ही शत्रु की उपस्थिति का कोई ज्ञान न रहता था; अतएव वे युद्ध के लिए सन्नद्ध नहीं रहते थे। अकस्मात् शत्रु-प्रवाह के मुख में पतित होकर वे प्रायः बिना युद्ध के ही प्राण गँवा बैठते थे।
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