Skip to content
Back to story
दुर्गेशनंदिनी Matribhasa Hindi · द्वितीय खंड — ऊनविंश परिच्छेद : आयशा का पत्र
A historical fiction-themed illustration for दुर्गेशनंदिनी

द्वितीय खंड — ऊनविंश परिच्छेद : आयशा का पत्र

9.2K 1.3K 0

आयशा हाथ में लेखनी लिए पत्र लिखने बैठी हैं। मुखकांति गंभीर, स्थिर है; वे जगत्सिंह को पत्र लिख रही हैं। एक कागज़ लेकर उन्होंने पत्र आरंभ किया। पहले लिखा, “प्राणाधिक”, उसी समय ‘प्राणाधिक’ शब्द काटकर लिखा, “राजकुमार”; ‘प्राणाधिक’ शब्द काटकर ‘राजकुमार’ लिखते समय आयशा की अश्रुधारा विगलित होकर पत्र पर गिर पड़ी। आयशा ने तुरंत ही वह पत्र फाड़ डाला। पुनः दूसरे कागज़ पर आरंभ किया; किंतु अभी कुछ ही पंक्तियाँ लिखी गई थीं कि फिर से पत्र अश्रु-कलंकित हो गया। आयशा ने वह पत्र भी विनष्ट कर दिया। इस बार उन्होंने अश्रु-चिह्न-रहित एक पत्र समाप्त किया। समाप्त करके वे उसे एक बार पढ़ने लगीं; पढ़ते-पढ़ते नयन-वाष्प से दृष्टि लोप होने लगी। किसी प्रकार पत्र बद्ध करके उन्होंने उसे दूत के हाथ में दे दिया। पत्र लेकर दूत राजपूत-शिविराभिमुख प्रस्थान कर गया। आयशा एकाकिनी पलंग पर शयन किए रोने लगीं।

जगतसिंह पत्र पाकर पढ़ने लगे।

राजकुमार!

मैंने जो तुमसे भेंट नहीं की, वह अपने आत्म-धैर्य के प्रति अविश्वासिनी होने के कारण नहीं। यह न समझना कि आयशा अधीर है। उस्मान ने अपने हृदय में अग्नि प्रज्वलित कर रखी है; क्या जाने, यदि मैं तुमसे भेंट करती और उसे कष्ट पहुँचता, इसी कारण मैंने तुमसे भेंट नहीं की। भेंट न होने से तुम कष्ट पाओगे, ऐसी आशा भी मुझे न थी। रहा मेरा अपना कष्ट—सो वे समस्त सुख-दुःख मैंने जगदीश्वर के चरणों में समर्पित कर दिए हैं। यदि मुझे तुम्हें साक्षात् विदा देना होता, तो वह कष्ट मैं अनायास सह लेती। तुमसे जो भेंट न हो सकी, इस कष्ट को भी मैं पाषाणी की भाँति सह रही हूँ।

तो फिर मैं यह पत्र क्यों लिख रहा हूँ? एक भिक्षा है, उसी हेतु मैंने यह पत्र लिखा। यदि तुमने सुना हो कि मैं तुमसे स्नेह करता हूँ, तो उसे विस्मृत कर दो। इस देह के रहते यह बात प्रकट न करने का संकल्प था, विधाता की इच्छा से प्रकट हो गई है; अब इसे विस्मृत कर दो।

मैं तुम्हारी प्रेमाकांक्षिणी नहीं हूँ। मुझे जो देना था, वह मैं दे चुकी हूँ; तुमसे प्रतिदान में कुछ नहीं चाहती। मेरा स्नेह ऐसा बद्धमूल है कि तुम स्नेह न भी करो, तब भी मैं सुखी हूँ; किंतु अब उस बात से क्या प्रयोजन!

मैंने तुम्हें दुःखी देखा था। यदि कभी सुखी हो, तो आयशा का स्मरण कर समाचार भेजना। इच्छा न हो, तो समाचार न भेजना। यदि कभी अन्तःकरण में क्लेश पाओ, तो क्या आयशा का स्मरण करोगे?

मैंने जो तुम्हें पत्र लिखा है, अथवा यदि भविष्य में भी लिखूँ, तो लोग उसकी निंदा ही करेंगे। मैं निर्दोष हूँ, अतः उसमें कोई हानि न समझो—जब भी इच्छा हो, पत्र लिखना।

तुम जा रहे हो, सम्प्रति इस देश का परित्याग कर जा रहे हो। ये पठान शान्त नहीं हैं। अतः तुम्हारा पुनः इस देश में आगमन सम्भव है। किन्तु मुझसे अब पुनः साक्षात्कार न होगा। अपने हृदय में बारम्बार विचार करके मैंने यही स्थिर किया है। रमणी-हृदय जैसा दुर्दमनीय होता है, उसमें अधिक साहस अनुचित है।

केवल एक बार और तुमसे भेंट करने का मानस है। यदि तुम इस प्रदेश में विवाह करो, तो मुझे समाचार देना; मैं तुम्हारे विवाह-काल में उपस्थित रहकर तुम्हारा विवाह संपन्न कराऊँगी। जो तुम्हारी महिषी होंगी, उनके लिए कुछ सामान्य आभूषण संगृहीत करके रखे हैं; यदि समय मिला, तो स्वहस्त से पहनाऊँगी।

0 Next
Continue to next part Up next द्वितीय खंड — विंश परिच्छेद : दीप निर्वाणोन्मुख
Previous part

Recommended for you

Comments (0)

Log in to join the conversation.