महाउत्सव उपस्थित था। आज क़तलू ख़ाँ का जन्मदिवस था। दिन में रंग-रस, नृत्य, दान, आहार-पान इत्यादि में सभी व्यापृत थे। रात्रि में तो इससे भी अधिक। अभी-अभी सायंकाल व्यतीत हुआ था; दुर्ग के भीतर सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश था; सैनिक, सिपाही, उमरा, भृत्य, पुरजन, भिक्षुक, मद्यप, नट, नर्तकी, गायक, गायिका, वादक, ऐंद्रजालिक, पुष्प-विक्रेता, इत्र-विक्रेता, ताम्बूल-विक्रेता, भक्ष्य-सामग्री विक्रेता तथा हस्तशिल्प की वस्तुओं के विक्रेता—इन सब से चारों दिशाएँ परिपूर्ण थीं। जहाँ भी जाइए, वहाँ केवल दीपमाला, गीत-वाद्य, गंधवारि, पान, पुष्प, आतिशबाज़ी और वेश्याएँ।
अंतःपुर के भीतर भी स्थिति कुछ-कुछ ऐसी ही थी। नवाब का विहार-गृह अपेक्षाकृत अधिक शांत था, किंतु अपेक्षाकृत अधिक प्रमोद-पूर्ण। कक्ष-कक्ष में रजत-दीप, स्फटिक-दीप और सुवासित दीपक स्निग्ध-उज्ज्वल आलोक बरसा रहे थे; सुवासित पुष्पमालाएँ पुष्प-पात्रों में, स्तंभों पर, शय्याओं पर, आसनों पर तथा अंतःपुर की रमणियों के अंगों पर सुशोभित हो रही थीं; पवन मानो गुलाब के इत्र की महक का भार वहन करने में असमर्थ हुआ जा रहा था; अनगिनत परिचारिकाएँ कोई स्वर्ण-गोटेदार वस्त्र, तो कोई अपनी इच्छानुसार नील, लोहित, श्यामल, पाटल आदि रंगों के चीनी रेशमी वस्त्र धारण किए हुए, अपने अंगों के सुवर्ण-आभूषणों को प्रत्येक दीपक के प्रकाश में चमकाती हुई भ्रमण कर रही थीं।
वे जिनकी दासियाँ थीं, वे रूपसी सुंदरी नारियाँ कक्ष-कक्ष में बैठी अत्यंत यत्नपूर्वक अपना वेष-विन्यास कर रही थीं। आज नवाब प्रमोद-भवन में पधारकर सभी को साथ लेकर आमोद-प्रमोद करेंगे; नृत्य-संगीत होगा। जिसकी जो अभिलाषा है, वह उसे सिद्ध करवा लेगी। कोई आज भाई को नौकरी दिलवा देने की आशा से सिर में ज़ोर-ज़ोर से कंघी घुमा रही थी। दूसरी, अपनी परिचारिकाओं की संख्या बढ़ा लेने का विचार कर, अपनी अलकावलि वक्षस्थल तक लटका रही थी। किसी को अपने नवजात पुत्र के पारितोषिक-स्वरूप कुछ संपत्ति हस्तगत करने की अभिलाषा थी, इसलिए कपोलों पर रक्तिम आभा लाने के अभिप्राय से उन्हें रगड़ते-रगड़ते रक्त निकाल बैठी; तो कोई नवाब की किसी प्रेयसी ललना द्वारा सद्यःप्राप्त रत्नाभूषणों के समान ही आभूषण पाने की लालसा से अपनी आँखों के नीचे कान तक गाढ़ा कज्जल अँज रही थी।
किसी चंडी को वस्त्र पहनाते समय दासी उसके पेशवाज़ पर पाँव दे बैठी; उस चंडी ने उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। किसी प्रगल्भा के वय-प्रभाव के कारण केश-पाश की जड़ें शिथिल होती जा रही थीं; केश-सज्जा करते समय दासी ने कंघी लगाई तो कुछ बाल कंघी के साथ ही निकल आए; यह देखकर वे केशाधिकारिणी सजल नेत्रों से उच्च स्वर में विलाप करने लगीं।
कुसुमवन में स्थलपद्म की भाँति और विहंगकुल में कलापी के समान, एक सुंदरी अपना वेश-विन्यास पूर्ण कर कक्ष-कक्ष में भ्रमण कर रही थीं। आज किसी को कहीं भी जाने में कोई बाधा न थी। जहाँ का जो सौंदर्य था, विधाता ने उस सुंदरी को वही प्रदान किया था; जिस स्थान का जो अलंकार था, कतलु खाँ ने उसे वही दिया था; तथापि उस रमणी के मुखमंडल पर लेशमात्र भी सौंदर्य-गर्व या अलंकार-गर्व का चिह्न न था। आमोद, हास, कुछ भी न था। मुखकांति गंभीर और स्थिर थी; नेत्रों में कठोर ज्वाला थी।
विमला इस प्रकार प्रासाद के भीतर स्थान-स्थान पर भ्रमण करने के उपरांत एक सुसज्जित कक्ष में प्रविष्ट हुईं, और प्रवेश के अनंतर द्वार अर्गलाबद्ध कर लिया। इस उत्सव के दिन भी उस कक्ष के भीतर मात्र एक क्षीण दीप जल रहा था। कक्ष के एक छोर पर एक पर्यंक था। उस पर्यंक पर आपादमस्तक चादर से आवृत होकर कोई सोया हुआ था। विमला पर्यंक के पार्श्व में खड़ी होकर मंद स्वर में बोलीं, “मैं आ गई हूँ।”
शयित व्यक्ति ने चकित की भाँति अपने मुख का आवरण दूर कर दिया। विमला को पहचानकर, शय्योत्तरच्छद त्यागकर, गात्रोत्थान करके बैठ गया; कोई उत्तर न दिया।
विमला ने पुनः कहा, “तिलोत्तमा! मैं आई हूँ।”
तथापि तिलोत्तमा ने कोई उत्तर न दिया। वह स्थिर दृष्टि से विमला के मुख की ओर देखती रही।
तिलोत्तमा अब वह ब्रीड़ाविवश बालिका न रही थी। उस क्षण उस क्षीण आलोक में उन्हें देखने पर प्रतीत होता था कि मानो दस वर्ष की वय-वृद्धि हो गई हो। देह अत्यन्त शीर्ण; मुख म्लान। परिधान में एक संकीर्णायतन वस्त्र था। अविन्यस्त केशभार में धूलिराशि उलझी हुई थी। अंग पर अलंकार का लेश न था; केवल पूर्व में जो अलंकार वे धारण करती थीं, उनके चिह्न मात्र शेष थे।
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