मैंने पूर्व में ही कहा है कि गढ़ मान्दारण की कोई निर्धन रमणी मेरे पिता के औरस से गर्भवती हुई थी। मेरी माता के भाग्यलेख का जैसा फल था, इनके साथ भी वही घटित हुआ। इनके गर्भ से भी एक कन्या ने जन्म लिया, और कन्या की माता शीघ्र ही विधवा हो जाने पर, वे मेरी माता की भाँति अपने कायिक परिश्रम द्वारा अर्थोपार्जन करके कन्या का पालन-पोषण करने लगीं। विधाता का ऐसा नियम नहीं है कि जैसा आकर हो, तदनुरूप ही वस्तु की उत्पत्ति होगी। पर्वत के पाषाण में भी कोमल कुसुमलता जन्म लेती है; अंधकारमयी खनि के मध्य भी उज्ज्वल रत्न उत्पन्न होता है।
दरिद्र के घर में भी अद्भुत सुंदरी कन्या उत्पन्न हुई। विधवा की वह कन्या गढ़ मान्दारण ग्राम में प्रसिद्ध सुंदरी के रूप में परिगणित होने लगीं। कालक्रम में सभी का लय होता है; कालान्तर में विधवा के कलंक का भी लय हो गया। विधवा की वह सुंदरी कन्या कि जारजा है, यह बात अनेक लोग विस्मृत हो गए। बहुतेरे तो यह जानते ही न थे। दुर्ग के मध्य प्रायः कोई भी यह बात न जानता था। और अधिक क्या कहूँ? वही सुंदरी तिलोत्तमा की गर्भधारिणी हुईं।
जब तिलोत्तमा मातृगर्भ में थी, तब इसी विवाह के कारण मेरे जीवन की प्रधान घटना घटित हुई। उसी समय एक दिन पिता अपने जामाता को संग लेकर आश्रम में आए। मेरे समक्ष उनका परिचय मंत्रशिष्य कहकर दिया, किंतु स्वर्गीय स्वामी से मुझे उनका वास्तविक परिचय प्राप्त हुआ।
जब से मैंने उन्हें देखा, तभी से मेरा अपना चित्त पराया हो गया। किंतु भला किस भाँति वे सब बातें आपसे कहूँ? बीरेंद्रसिंह समझ गए कि विवाह के बिना वे मुझे प्राप्त न कर सकेंगे। पिता भी समस्त वृत्तांत अनुभव से जान गए; एक दिन जब दोनों में इस प्रकार की बातचीत हो रही थी, तब मैंने ओट से सुन लिया।
पिता ने कहा, “मैं विमला का परित्याग करके कहीं नहीं रह सकता। किन्तु यदि विमला तुम्हारी धर्मपत्नी हो, तो मैं तुम्हारे समीप रहूँगा। और यदि तुम्हारा वह अभिप्राय न हो—”
पिता की बात समाप्त होने भी न पाई थी कि स्वर्गीय देव किंचित् रुष्ट होकर बोले, ‘ठाकुर! शूद्री-कन्या से किस प्रकार विवाह करूँ?’
पिता ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ‘जारज कन्या से किस प्रकार विवाह कर लिया?’
प्राणेश्वर ने किंचित् व्यथित होकर कहा, “जब मैंने विवाह किया था, तब मुझे ज्ञात न था कि वह जारजा है। सब जानते-बूझते शूद्रा से किस प्रकार विवाह करता? और आपकी ज्येष्ठ कन्या जारजा होने पर भी शूद्रा नहीं है।”
पिता ने कहा, ‘यदि तुम विवाह अस्वीकार करते हो, तो उत्तम। तुम्हारे आवागमन से विमला का अनिष्ट हो रहा है, तुम्हें अब इस आश्रम में आने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम्हारे गृह पर ही मुझसे भेंट होगी।’
तभी से उन्होंने कतिपय दिनों के लिए आना-जाना त्याग दिया। मैं चातकी की भाँति प्रतिदिन उनके आगमन की प्रतीक्षा करती थी; किंतु कुछ काल तक आशा निष्फल होती रही। प्रतीत होता है, वे और अधिक स्थिर न रह सके। वे पुनः पूर्ववत् आना-जाना करने लगे। इस कारण पुनः उनके दर्शन पाकर मैं वैसी लज्जाशीला न रही। पिता ने इसका अवलोकन किया। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाकर कहा, ‘मैंने अनाश्रम-व्रत-धर्म अंगीकार किया है; चिरकाल तक मेरी पुत्री के साथ मेरा वास न हो सकेगा। मैं स्थान-स्थान पर पर्यटन करने जाऊँगा, तुम तब कहाँ रहोगी?’
मैं पिता के विरह की आशंका से अत्यंत कातर होकर रोने लगी। मैंने कहा, ‘मैं तुम्हारे साथ-साथ जाऊँगी। नहीं तो, जिस प्रकार काशीधाम में एकाकिनी थी, यहाँ भी उसी प्रकार रहूँगी।’
पिता ने कहा, ‘नहीं विमले! मैंने उससे उत्तम संकल्प किया है। मेरी अनुपस्थिति में तुम्हारे सुरक्षक का विधान करूँगा। तुम महाराज मानसिंह की नवोढ़ा महिषी के साहचर्य में नियुक्त रहोगी।’
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