दुर्ग-विजय के दो दिवस पश्चात्, लगभग एक प्रहर दिन बीतने पर, कतलू ख़ाँ अपने दुर्ग के भीतर दरबार में आसीन हैं। दोनों ओर श्रेणीबद्ध होकर सभासदगण दंडायमान हैं। सम्मुख स्थित भूमि-खंड पर बहु-सहस्र जन निःशब्द बने हुए हैं। अद्य वीरेंद्रसिंह को दंड दिया जाना है।
कतिपय शस्त्रपाणि प्रहरियों ने वीरेंद्रसिंह को शृंखलाबद्ध कर दरबार में प्रस्तुत किया। वीरेंद्रसिंह की आकृति रक्तवर्ण थी, किंतु उसमें भीति का चिह्न लेशमात्र भी न था। प्रदीप्त नेत्रों से अग्निकण स्फुरित हो रहे थे; नासारंध्र स्फीत होकर कंपित हो रहे थे। वे दाँतों से अधर दंशित कर रहे थे। कतलू खाँ के समक्ष उपस्थित किए जाने पर, कतलू खाँ ने वीरेंद्र से पूछा, “वीरेंद्रसिंह! मैं तुम्हारे अपराध का तुम्हें दंड दूँगा। तुम किस कारण मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे थे?”
वीरेंद्रसिंह ने अपने आरक्त रूप में प्रकट क्रोध का संवरण करते हुए कहा, “मैंने तुम्हारे विरुद्ध कौन-सा कर्म किया है, वह सर्वप्रथम मुझे बताओ।”
एक पारिषद ने कहा, “विनयपूर्वक बात करो।”
कतलू ख़ाँ बोले, “किस कारण मेरे आदेशानुसार मुझे धन और सेना भेजने में तुम असम्मत हुए थे?”
वीरेन्द्रसिंह ने अकुतोभय होकर कहा, “तुम राजद्रोही दस्यु हो; तुम्हें धन किसलिए दूँ? तुम्हें किस हेतु सेना दूँ?”
दर्शकवृंद ने देखा कि वीरेंद्र स्वयं अपना मस्तक काटने को उद्यत हैं।
कतलू ख़ाँ का कलेवर क्रोध से कंपित हो उठा। उन्होंने सहसा क्रोध संवरण करने की क्षमता अभ्यास-सिद्ध कर रखी थी; अतएव किंचित् स्थिर भाव से बोले, “तुमने मेरे अधिकार में निवास करके मुग़लों के साथ मेल क्यों किया था?”
वीरेंद्र बोले, “तुम्हारा अधिकार कहाँ है?”
कतलु खाँ और भी कुपित होकर बोले, “सुन दुरात्मा! तू अपने कर्मोचित फल को पाएगा। अब तक तेरे जीवन की आशा थी, किंतु तू निर्बोध, अपने दर्प से स्वयं अपने वध का उद्योग कर रहा है!”
वीरेंद्रसिंह ने सगर्व हास्य किया; बोले, “कतलू ख़ाँ – जब मैं तुम्हारे पास श्रृंखलाबद्ध होकर आया हूँ, तब दया की प्रत्याशा लेकर नहीं आया। तुम्हारे तुल्य शत्रु की दया पर फिर जीवन-रक्षा, — क्या उस जीवन का कोई प्रयोजन है? तुम्हें आशीर्वाद देकर प्राण त्याग देता; किंतु तुमने मेरे पवित्र कुल पर कालिख पोत दी है; तुमने मेरे प्राणों से अधिक प्रिय धन को____”
वीरेन्द्रसिंह आगे और कुछ न कह सके; स्वर अवरुद्ध हो गया, नेत्र वाष्पाकुल हो उठे; निर्भीक एवं गर्वित वीरेन्द्रसिंह अधोमुख होकर रुदन करने लगे।
कतलू ख़ाँ स्वभावतः निष्ठुर थे; इतने निष्ठुर कि पर-पीड़ा में उन्हें उल्लास होता था। दंभी वैरी की ऐसी दशा देखकर उनका मुख हर्षोत्फुल्ल हो उठा। उन्होंने कहा, “वीरेंद्रसिंह! क्या तुम मुझसे कुछ याचना न करोगे? विचार करके देखो, तुम्हारा समय निकट है।”
जिस दुःसह संतापाग्नि से बीरेंद्र का हृदय दग्ध हो रहा था, रुदन करने से उसका किंचित् शमन हुआ। पूर्वापेक्षा स्थिर भाव से उन्होंने उत्तर दिया, “और कुछ नहीं चाहता, केवल यही भिक्षा है कि मेरा वध-कार्य शीघ्र समाप्त करो।”
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