विमला को देखकर जगतसिंह ने पूछा, “यह कैसा कोलाहल है?”
विमला ने कहा, “पठानों का जयघोष! शीघ्र कोई उपाय कीजिए; शत्रु अब तिलार्ध मात्र में इस कक्ष के भीतर आ पहुँचेगा।”
जगतसिंह क्षण भर विचार करके बोले, “वीरेंद्रसिंह क्या कर रहे हैं?”
विमला ने कहा, “वे शत्रु के हाथों बंदी हो गए हैं।”
तिलोत्तमा के कंठ से अस्फुट चीत्कार निःसृत हुआ; वह पर्यंक पर मूर्छित होकर गिर पड़ीं।
जगतसिंह विशुष्कमुख होकर विमला से बोले, “देखो, देखो, तिलोत्तमा को देखो।”
विमला ने तत्क्षण गुलाबपाश से गुलाबजल लेकर तिलोत्तमा के मुख, कण्ठ तथा कपोलों पर सिंचन किया, और कातर चित्त से व्यजन करने लगीं।
शत्रु-कोलाहल और भी समीप आ गया; विमला लगभग रोते-रोते कहने लगीं, “वह आ रहा है!—राजपुत्र! क्या होगा?”
जगत्सिंह के नेत्रों से अग्नि-स्फुलिंग निर्गत होने लगे। उन्होंने कहा, “अकेला मैं क्या कर सकता हूँ? परंतु तुम्हारी सखी की रक्षार्थ प्राण त्याग दूँगा।”
शत्रु का भीमनाद और भी निकट आ पहुँचा। शस्त्रों की झंकार भी सुनाई देने लगी। विमला चीत्कार कर उठीं, “तिलोत्तमा! इस समय तुम अचेत क्यों हो गईं? किस प्रकार तुम्हारी रक्षा करूँ?”
तिलोत्तमा ने अपने नेत्र उन्मीलित किए। विमला बोलीं, “तिलोत्तमा को चेतना आ रही है; राजकुमार! राजकुमार! अब भी तिलोत्तमा को बचा लो!”
राजकुमार ने कहा, “इस कक्ष के भीतर रहते हुए किसकी सामर्थ्य है जो रक्षा कर सके! यदि तुम अब भी इस कक्ष से बाहर निकल पातीं, तो मैं तुम लोगों को दुर्ग के बाहर ले जाने में कदाचित् समर्थ हो भी जाता; किंतु तिलोत्तमा में तो गतिशक्ति ही नहीं है। विमले! वह पठान सीढ़ियाँ चढ़ रहा है। मैं सर्वप्रथम अपने प्राण दूँगा ही, किंतु बड़ा परिताप है कि प्राण देकर भी तुम लोगों को बचा न सका।”
बिमला ने पलक झपकते ही तिलोत्तमा को गोद में उठा लिया और कहा, “तो चलिए; मैं तिलोत्तमा को ले जा रही हूँ।”
विमला और जगत्सिंह तीन छलाँगों में कक्षद्वार पर आ गए। उसी समय चार पठान सैनिक भी तीव्र वेग से दौड़ते हुए कक्षद्वार पर आ पहुँचे। जगत्सिंह ने कहा, "विमला, अब कोई उपाय नहीं रहा, मेरे पीछे आओ।
पठानों ने शिकार को सम्मुख पाकर “अल्ला-ल्ला-हो” का चीत्कार करते हुए, पिशाचों की भाँति उछलना आरम्भ कर दिया।
उनकी कटि में स्थित अस्त्रों से झंकार हो उठी। वह चीत्कार समाप्त भी न हो पाया था कि जगत्सिंह की असि एक पठान के हृदय में आमूल प्रविष्ट हो गई। भीषण चीत्कार करता हुआ वह पठान प्राण त्याग बैठा। पठान के वक्ष से असि खींचने से पूर्व ही एक अन्य पठान के भाले का फलक जगत्सिंह के ग्रीवा-प्रदेश पर आ लगा; भाला गिरते न गिरते विद्युद्वत् हस्त-संचालन द्वारा कुमार ने उस भाले को बाएँ हाथ में थाम लिया; तथा तत्क्षण उसी भाले के प्रतिघात से भाला-निक्षेपक को धराशायी कर दिया। शेष दो पठानों ने निमेष-मात्र में एक साथ जगत्सिंह के मस्तक को लक्ष्य बनाकर असि से प्रहार किया; जगत्सिंह ने पलक झपकने का अवकाश न लेते हुए दाहिने हाथ की असि के आघात से एक की असि के साथ ही उसका प्रकोष्ठ काटकर भूतल पर गिरा दिया; द्वितीय के प्रहार का निवारण वे न कर सके; असि मस्तक पर तो न लगी, किन्तु स्कन्ध-देश पर उन्हें भीषण आघात लगा।
कुमार आघात पाकर वेदना से व्याध के बाण से बिद्ध व्याघ्र के समान द्विगुणित प्रचंड हो उठे; पठान असि उठाकर पुनः प्रहार का उद्योग कर भी न पाया था कि कुमार ने दोनों हाथों से सुदृढ़ मुष्टिबद्ध करके भीषण असि धारणपूर्वक छलाँग लगाई और प्रहारकर्ता पठान के मस्तक पर दे मारी, उष्णीष सहित पठान का मस्तक दो खण्डों में विभक्त होकर गिर पड़ा। किन्तु इसी अवसर पर जिस सैनिक का हस्तच्छेद हुआ था, उसने बाएँ हाथ से कटि से तीक्ष्ण छुरिका निकालकर राजपुत्र के शरीर को लक्ष्य बनाया, और जैसे ही राजपुत्र का उल्लम्फित शरीर भूतल पर अवतरित हो रहा था, वैसे ही वह छुरिका राजपुत्र की विशाल भुजा में गहराई तक बिंध गई।
राजपुत्र ने उस आघात को केवल सूचीवेध-मात्र मानकर पठान की कटि पर पर्वतपात के समान पदाघात किया, जिससे वह यवन दूर जा गिरा। राजपुत्र तीव्र वेग से धावमान होकर उसका शिरच्छेद करने का उद्योग कर ही रहे थे कि उसी समय भीषण नाद से “अल्ला-ल्ला-हो” का घोष करता हुआ अगणित पठान-सेना का स्रोत कक्ष में प्रविष्ट हुआ।
राजपुत्र ने देखा कि युद्ध करना केवल मरण का कारण है।
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