दिग्गज गजपति की मनमोहिनी आशमानी कैसी रूपवती है, यह जानने के लिए पाठक महोदय के मन में कौतूहल उत्पन्न हुआ होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। अतएव उनकी यह साध पूर्ण करूँगा। किंतु स्त्री के रूप-वर्णन के विषय में ग्रंथकारगण जिस पद्धति का अवलंबन करते आए हैं, मुझ जैसे अकिंचन जन का उस पद्धति से बहिर्भूत होना अत्यंत धृष्टता का विषय है। अतएव, सर्वप्रथम मंगलाचरण करना ही कर्तव्य है।
हे वाग्देवि! हे कमलासने! शरदिन्दुनिभानने! अमलकमल-दलनिन्दित-चरण-भक्तभजन-वत्सले! मुझे उन चरणकमलों की छाया दान करो; मैं आशमानी के रूप का वर्णन करूँगा। हे अरविन्दानन-सुन्दरीकुल-गर्व-खर्वकारिणि! हे विशाल रसाल दीर्घ-समास-पटल-सृष्टिकारिणि! एक बार पदनख के एक पार्श्व में स्थान दो, मैं रूप का वर्णन करूँगा। समास-परवल, सन्धि-बैंगन, उपमा-कच्चे केले की चड़चड़ी राँधकर तुम्हें इस खिचड़ी का भोग लगाऊँगा। हे पण्डितकुलेप्सित-पयःप्रस्रविणि! हे मूर्खजन-प्रति क्वचित् कृपाकारिणि! हे अङ्गुलि-कण्डूयन-विषमविकार-समुत्पादिनि!
हे वटतल्ला-विद्याप्रदीप-तैलप्रदायिनि! मेरी बुद्धि का प्रदीप एक बार उज्ज्वल कर जाओ। माँ! तुम्हारे दो रूप हैं; जिस रूप में तुम कालिदास को वरप्रदा हुई थीं, जिस प्रकृति के प्रभाव से रघुवंश, कुमारसम्भव, मेघदूत, शकुन्तला ने जन्म लिया था, जिस प्रकृति का ध्यान कर वाल्मीकि ने रामायण, भवभूति ने उत्तरचरित, भारवि ने किरातार्जुनीय की रचना की थी, उस रूप में मेरे स्कन्ध पर आरोहण कर पीड़ा उत्पन्न न करना; जिस मूर्ति की भावना कर श्रीहर्ष ने नैषध लिखा था, जिस प्रकृति के प्रसाद से भारतचन्द्र ने विद्या का अपूर्व रूप-वर्णन कर बंगदेश का मन मोहा है, जिसके प्रसाद से दाशरथि राय का जन्म हुआ, जिस मूर्ति में आज भी वटतल्ला को आलोकित कर रही हो, उसी मूर्ति में एक बार मेरे स्कन्ध पर आविर्भूत होओ, मैं आशमानी के रूप का वर्णन करूँ।
आसमानी की वेणी की शोभा सर्पिणी के सदृश थी; सर्पिणी ने उसी संताप से मन में विचारा कि यदि मैं वेणी से ही पराजित हो गई, तो फिर इस देह को लोगों के सम्मुख लिए फिरने की क्या आवश्यकता! मैं बिल में प्रवेश करती हूँ। यह सोचकर सर्पिणी बिल के भीतर चली गई। ब्रह्मा ने देखा कि बड़ा अनर्थ हुआ; सर्पिणी बिल में चली गई, तो मनुष्यों को डसेगा कौन? यह विचार कर उन्होंने सर्पिणी की पूँछ पकड़कर उसे खींचकर बाहर निकाल लिया; सर्पिणी बाहर आई, पुनः अपना मुख दिखाना पड़ा, इस क्षोभ से सिर पटकने लगी; सिर पटकते-पटकते उसका सिर चपटा हो गया, और तभी से सर्प के फण का आविर्भाव हुआ।
आसमानी का मुखचंद्र अत्यधिक सुंदर था, अतः चंद्रदेव उदित न हो सकने के कारण ब्रह्मा के समीप गुहार लगाने पहुँचे। ब्रह्मा ने कहा, "भय मत करो, तुम जाकर उदित होओ, आज से स्त्रियों का मुख आच्छादित रहेगा"; उसी समय से घूँघट की सृष्टि हुई।
नयन दोनों मानो खंजन पक्षी हों; कहीं यह पक्षी पंख फैलाकर उड़ न भागे, इस हेतु विधाता ने पलक-रूपी पिंजड़े के किवाड़ बना दिए हैं। नासिका गरुड़ की नासा के समान अत्यंत विशाल थी; यह देखकर गरुड़ आशंकावश वृक्ष पर जा चढ़ा; तभी से समस्त पक्षी-कुल वृक्षों पर ही रहता है। किसी अन्य कारण से दाड़िम वंगदेश छोड़कर पटना क्षेत्र की ओर भाग निकला; और हस्ती अपने कुंभ को लेकर ब्रह्मदेश पलायन कर गया; शेष रह गए थे धवलगिरि; उन्होंने देखा कि मेरा शिखर ही भला कितना ऊँचा है, ढाई कोस से अधिक तो नहीं, किंतु यह शिखर न्यून से न्यून तीन कोस का होगा; यह सोचते-सोचते धवलगिरि का मस्तक उत्तप्त हो उठा और वे बर्फ उड़ेलने लगे; वे तभी से सिर पर बर्फ रखे बैठे हैं।
भाग्यलिपि के दोष से आशमानी विधवा थी! आशमानी ने दिग्गज की कुटिया पर आकर देखा कि कुटिया का द्वार रुद्ध है, भीतर दीपक जल रहा है। उसने पुकारा, “ओ ठाकुर!”
किसी ने कोई उत्तर न दिया।
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