निशीथकाल में जगत्सिंह ने शैलेश्वर के मंदिर से प्रस्थान किया। संप्रति उनके अनुगमन अथवा मंदिर की अधिष्ठात्री उस मनोमोहिनी का वृत्तांत सुनाकर मैं पाठक महाशयों के कौतूहल का निवारण न कर सका। जगत्सिंह राजपूत थे; वे किस प्रयोजन से बंगदेश में आए थे, और क्यों उस प्रान्तर के मध्य एकाकी गमन कर रहे थे, इसका परिचय देने के उपलक्ष्य में इसी समय बंगदेश-संबंधी कतिपय राजकीय घटनाओं का संक्षेप में विवरण देना आवश्यक हो गया। अतएव यह परिच्छेद इतिवृत्तात्मक है। यदि पाठकवर्ग नितांत अधीर हों तो वे इसका त्याग कर सकते हैं, किंतु ग्रंथकार का परामर्श यही है कि अधैर्य उचित नहीं।
सर्वप्रथम वंगदेश में बख्तियार खिलजी के मुहम्मदीय विजय-ध्वजा संस्थापित करने के पश्चात्, मुसलमान निर्बाध रूप से शताब्दियों तक तद्राज्य पर शासन करते रहे। ९७२ हिजरी में सुविख्यात सुल्तान बाबर ने रणक्षेत्र में दिल्ली के बादशाह इब्राहीम लोदी को पराभूत कर, तत्सिंहासन पर आरोहण किया; किन्तु तत्काल ही वंगदेश तैमूरलंग के वंशजों के दण्डाधीन नहीं हुआ।
जब तक मुग़ल सम्राटों के कुलतिलक अकबर का अभ्युदय नहीं हुआ था, तब तक इस देश में स्वतंत्र पठान नरेश राज्य कर रहे थे। किसी कुक्षण में मतिहीन दाऊद ख़ाँ ने सुप्त सिंह के अंग पर हस्तक्षेप कर दिया; और स्वकर्मफल से अकबर के सेनापति मुनीम ख़ाँ द्वारा पराजित होकर राज्यभ्रष्ट हो गए। दाऊद ९८२ हिजरी वर्ष में सगण उड़ीसा पलायन कर गए; और बंगाल राज्य मुग़ल भूपाल के कर-कबलित हो गया। पठानों के उत्कल में संस्थापित हो जाने पर, वहाँ से उनका उच्छेद करना मुग़लों के लिए अति कष्टसाध्य हो गया। ९८६ वर्ष में दिल्लीश्वर के प्रतिनिधि ख़ाँ जहाँ ख़ाँ ने पठानों को द्वितीय बार पराजित करके उत्कल देश को अपने प्रभु के दंडाधीन कर लिया।
इसके पश्चात एक और दारुण उपद्रव उपस्थित हुआ था। अकबर शाह द्वारा बंगाल देश के राजकर संचय की जो नवीन प्रणाली संस्थापित हुई, उससे जागीरदार आदि भूस्वामियों में गंभीर असंतोष उपज आया। वे अपने-अपने पूर्व आधिपत्य की रक्षा हेतु खड्गहस्त हो उठे। अत्यंत दुर्दम्य राजविद्रोह उपस्थित होने से, अवसर पाकर उड़ीसा के पठानों ने पुनर्वार मस्तक उन्नत किया और क़तलू ख़ाँ नामक एक पठान को आधिपत्य में वरण कर पुनरपि उड़ीसा स्वकरगत कर लिया। मेदिनीपुर भी उनके अधिकारभुक्त हो गया।
कर्मठ राजप्रतिनिधि ख़ाँ आज़िम और तत्पश्चात् शाहबाज़ ख़ाँ—इनमें से कोई भी शत्रुविजित देश का पुनरुद्धार न कर सका। अंततः इस दुसाध्य कार्य की सिद्धि हेतु एक हिंदू योद्धा प्रेषित किया गया।
महामति अकबर अपने पूर्ववर्ती सम्राटों की अपेक्षा सर्वथा विज्ञ थे। उनके हृदय में यह विशेष प्रतीति उत्पन्न हुई थी कि एतद्देशीय राजकार्य के संपादन में एतद्देशीय जन ही विशेष पटु हैं—विदेशी वैसे नहीं हैं; तथा युद्ध एवं राज्य-शासन में राजपूतगण दक्षता में अग्रगण्य हैं। अतएव वे सर्वदा एतद्देशीयों, विशेषतः राजपूतों को गुरुतर राजकार्यों में नियुक्त करते थे।
आख्यायिका में वर्णित काल में जो राजपूत उच्च पदाभिषिक्त थे, उनमें मानसिंह एक प्रधान थे। वे स्वयं अकबर के पुत्र सलीम के श्यालक थे। अजीम खाँ और शाहबाज खाँ के उत्कल-विजय में असमर्थ होने पर, अकबर ने इस महात्मा को बंग और बिहार का शासनकर्ता बनाकर भेजा।
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