दूसरे दिन स्नान-पूजा से छुट्टी पाकर कुंअर वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी फिर उस खंडहर में घुसे, सिरका साथ में लेते गये। कल जो पत्थर निकला था उस पर जो कुछ लिखा था फिर पढ़ के याद कर लिया और उसी लिखे के बमूजिब काम करने लगे। बाहर दरवाजे पर बल्कि खंडहर के चारों तरफ पहरा बैठा हुआ था।
बगुले के पास गये, उसके सामने की तरफ जो सफेद पत्थर जमीन में गड़ा हुआ था, जिस पर पैर रखने से बगुला मुंह खोल देता था, उखाड़ लिया। नीचे एक और पत्थर कमानी पर जड़ा हुआ पाया। सफेद पत्थर को सिरके में खूब बारीक पीसकर बगुले के सारे बदन में लगा दिया। देखते-देखते वह पानी होकर बहने लगा, साथ ही इसके एक खूशबू-सी फैलने लगी। दो घंटे में बगुला गल गया। जिस खंभे पर बैठा था वह भी बिल्कुल पिघल गया, नीचे की कोठरी दिखाई देने लगी जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां थीं और इधर-उधर बहुत से तार और कलपुर्जे वगैरह लगे हुए थे। सबों को तोड़ डाला और चारों आदमी नीचे उतरे, भीतर ही भीतर उस कुएं में जा पहुंचे जहां हाथ में किताब लिये बुङ्ढा आदमी बैठा था, सामने एक पत्थर की चौकी पर पत्थर ही के बने रंग-बिरंगे फूल रखे हुए देखे।
बाजू पकड़ते ही बुङ्ढे ने मुंह खोल दिया, तेजसिंह से काफूर लेकर कुमार ने उसके मुंह में भर दिया। घंटे भर तक ये लोग उसी जगह बैठे रहे। तेजसिंह ने एक मशाल खूब मोटी पहले ही से बाल ली थी। जब बुङ्ढा गल गया किताब जमीन पर गिर पड़ी, कुमार ने उठा लिया। उसकी जिल्द भी जिस पर कुछ लिखा हुआ था भोजपत्र ही की थी। कुमार ने पढ़ा, उस पर यह लिखा हुआ पाया-
''इन फूलों को भी उठा लो, तुम्हारे ऐयारों के काम आवेंगे। इनके गुण भी इसी किताब में लिखे हुए हैं, इस किताब को डेरे में ले जाकर पढ़ो, आज और कोई काम मत करो।''
तेजसिंह ने बड़ी खुशी से उन फूलों को उठा लिया जो गिनती में छ: थे। उस कुएं में से कोठरी में आकर ये लोग ऊपर निकले और धीरे- धीरे खंडहर के बाहर हो गये।
थोड़ा दिन बाकी था जब कुंअर वीरेन्द्रसिंह अपने डेरे में पहुंचे। यह राय ठहरी कि रात में इस किताब को पढ़ना चाहिए, मगर तेजसिंह को यह जल्दी थी कि किसी तरह फूलों के गुण मालूम हों। कुमार से कहा, ''इस वक्त इन फूलों के गुण पढ़ लीजिए बाकी रात को पढ़ियेगा।'' कुमार ने हंसकर कहा, ''जब कुल तिलिस्म टूट लेगा तब फूलों के गुण पढ़े जायेंगे।'' तेजसिंह ने बड़ी खुशामद की, आखिर लाचार होकर कुमार ने जिल्द खोली। उस वक्त सिवाय इन चारों आदमियों के उस खेमे में और कोई न था, सब बाहर कर दिये गये। कुमार पढ़ने लगे-
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